मेरे ही हाथों पर लिखी है तक़दीर मेरी, और मेरी ही तक़दीर पर मेरा बस नहीं———-
लेकिन , गौर से सोचो, क्या ये बात है सही——?
कहीं , इन चंद लकीरों के लिखने में कोई गलती तो नहीं हो
गयी———-?
अगर यही सच है , तो फिर उनका क्या जिनके नहीं हैं हाथ———उनका जीवन कैसे होगा आबाद?
अगर किसी हादसे में किसी के दोनों हाथ कट जायें, तो फिर उसका जीवन तो यक़ीनन हो गया बर्बाद !!
सच तो यही है कि आपकी तक़दीर इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितने मेहनती हैं, कितने हैं बुद्धिमान।
अगर ये सच सब समझ पाएँ तो फिर सब का हो जाये कल्याण।
ये चंद टेढ़ी मेढ़ी लकीरें, इस पर कैसे किसी की तक़दीर का हो सकता है दारोमदार——-?
लेकिन फिर भी इस बात को पत्थर की लकीर समझता है ये सारा संसार।
ख़ैर, मेरी सोच है मुक़्तलिफ़ , मैं अपने आत्म बल पर करता हूँ विश्वास।
परिश्रमी हूँ, एक नेक इनसान इंसान हूँ, और मेरे दिल में है प्रभु का वास ।
तो आजतक सफलता ने मेरे कदम चूमें हैं, और पूरी ज़िंदगी हम मस्ती में झूमें हैं।
भारतवर्ष में भी , और देश विदेश में भी हम बहुत घूमें हैं।
उस महा प्रभु का मैं हमेशा करता हूँ बहुत शुक्रिया, उसी के आशीर्वाद ने मेरे जीवन को है ख़ुशियों से भर दिया——!!!
लेखक——-निरेन कुमार सचदेवा।
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