धन्वंतरि ( धनतेरस की प्रासंगिकता)-“रजनी प्रभा”

कार्तिक मास के ( पुणिमान्त) कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से
पंचदिवसीय पर्व का शुभारंभ हो
जा जाता है। देवों और देत्यो के
हुए महासमर में समुद्र मंथन पर
हाथ में अमृत कलश लिए भगवन धन्वंतरि का प्रादुर्भाव
देवताओं के साथ- साथ जगत
को भी आरोग्य प्रदान करने हेतु हुआ था!

आज की तिथि का प्रत्येक धर्म में विशेष महत्व माना जाता हैं
कि आज ही के दिन के आगाज
में भगवान महावीर जी तीसरे
और चौथे दिन योग निरोध
के लिए चले गये थे। और दिवाली के दिन निर्वाण को
प्राप्त हुए थे तभी से इस तिथि
को धनतेरस या धान्य तेरस
भी कहा जाता हैं!

भगवन धन्वंतरि का प्रादुर्भाव चार हाथों के साथ हुआ। जिसमें
से एक हाथ में अमृत कलश दूसरे में औषधि ,तीसरे में चक्र
विद्यमान था। चूंकि इनके हाथ
में कलश भी था वो आज के तिथि को बर्तन खरीदने को सुख
समृद्धि से जोड़ दिया गया!
दूसरे हाथों में औषधि के होने के कारण आज की तिथि आरोग्य और आयुर्वेद को समर्पित हुई।
आयुर्वेद और आयु विज्ञान के जनक भगवन धन्वंतरि के मंदिर
समस्त विश्व में प्रसिद्ध है!
मान्यता है कि आयुर्वेद की शिक्षा
सर्वप्रथम ब्रह्मा ने अश्विनी देवों को दी फिर दक्ष को फिर इंद्र को इंद्र से धन्वंतरि को सर्वप्रथम धन्वंतरि मंदिर नेल्लूवाई – नेल्लू वाई में भगवन धन्वंतरि मंदिर की उत्पत्ति अश्विनी पुत्रो द्वारा 500 ई. पू. की गई!
यह मंदिर चिकित्सा के देवता चिकित्सा की सभी साखाओ
के उपासना मुर्ति के रुप पूजा
करते हैं!
नेल्लूवई भगवन धन्वंतरि मंदिर गुरुवायु और त्रिशुर से लगभग 20 किलोमीटर, दूर है आयुर्वेदिक चिकित्सक अपना
अभ्यास शुरु करने से पूर्व वहाँ
जाना शुभ मानते हैं म. प्र. इंदौर
में भी धन्वंतरि के तीसरे हाथ में शंख था वो आज के दिन से प्रारंभ होने वाले पंचदिवसीय पर्व में शंख खरीदने और उसे बजाने से विशेष, सुख सौभाग्य, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती हैं!ऐसी मान्यता है माना जाता हैं की कार्तिक मास संक्रमण काल
होता है। तो शरीर की रोगनिरोधक क्षमता क्षिण पड़ने लगती हैं! शंख को बचाने से फेफड़े मजबूत होते हैं नारी चक्र
संयमित रुप से कार्य करता है जिसमें उत्तम स्वास्थ्य का लाभ होता है!
चौथे हाथ में चक्र का होना तेज के प्रतीक के रुप में माना जाता हैं। और इसलिए आज के दिन दीपदान का विशेष महत्व हैं
क्यूंकि दीप के प्रकाश को प्रयाय
माना जाता है!
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार उस समय में एक राजा
हुआ करते थे उन्हें एक पुत्र था
ज्योतिषियों ने जब उसकी कुंडली देखी तो बताया की इस
बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके चौथे रोज ही यह
मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा
ये सब जान के राजा ने उसे
ऐसे अज्ञात स्थान पर भेज दिया
जहां कोई भी स्त्री ना हो मगर
विधि के विधान को टाला नहीं जा सकता विचारण करते हुए
वहाँ एक राज कन्या वहाँ से गुजरी फिर दोनों ने एक दूसरे
पर आसक्त हो गंधर्व विवाह कर
लिया!
अब बारी कर्मफल की थी तो विवाह के चौथे रोज यमदूत
उसके प्राण लेने पहुंच गये
पर नवविवाहिता का रुदन उन्हें
भी द्रवित कर गया उन्होनें आकर यमराज से कहा प्रभु क्या
ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे
अकाल मृत्यु का हल हो सके!
यमराज महाराज ने कहाँ – अकाल मृत्यु तो समय चक्र का
हिस्सा है! मगर फिर भी अगर
कोई मनुष्य कार्तिक मास की
कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी तिथि के
रात्री में मेरे नाम से एक दिया
घर के बाहर दक्षिण दिशा में मेरे नाम से जलाएगा उसे अकाल मृत्यु कभी नहीं सताएगी!और तभी से आज के दिन पहला दीया भगवान यम के नाम से यम दीया, जलाने जाने लगा
चूंकि समुद्र मंथन के दिन ही भगवान धन्वंतरि और माता लक्षमी दोनों का प्रादुर्भाव हुआ था अत: आज के दिन ही माता
लक्ष्मी एवं विघ्नहर्ता गणपति जी
की मुर्ति को घर लाने का विधान है भारत सरकार ने भी धनतेरस
को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया है
आज का दिन चिचित्सा के लिए अत्यंत खास माना जाता हैं!
आज के दिन माता लक्ष्मी जी के
वाहन उल्लू को देखना माता लक्ष्मी को देखना माता लक्ष्मी को देखने सम प्रतीकात्मक रुप
में देखने के समान माना जाता हैं
जो अत्यंत शुभफलकारी माना जाता हैं चूंकि आज से शुरु होने वाले पंच पर्व अपनी उल्लास से
मनाने की तमाम साम्रगी से बाजार की रौनक देखने बनती हैं
जाहीर सी बात ऐसे में बाजार बाद मालिया राज भी सक्रिय होते हैं! ऐसे में दिखावे और बहकावे से बचे।जरुरत की चीजें
जो प्रकृति के हित में हो वही खरीदें!
वैसे भी आयुर्वेद का एक ही श्वर
हैं ( प्रकृति की और लौटो और अपनी धर्म परंपरा संस्कृति को बचाओं)

( एकलशनै में दिये को सुर्य के हिस्से यानी तेज का प्रतीक माना जाता हैं ।। सधन्यवाद

रजनी प्रभा

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