वासना

वासना है तुम्हारी नजर ही में तो मैं क्या क्या ढकूं,तू ही बता क्या करूं के चैन की जिंदगी जी सकूं।।साडी पहनती हूं तो तुझे मेरी कमर दिखती है चलती हूं तो मेरी लचक पर अंगुली उठती है।।दुप्पटे को क्या शरीर पर नाप के लगाऊं मैं।कैसे अपने शरीर की संरचना को तुमसे छुपाऊं मैं ।।पीठ दिख जाए तो वो भी काम निशानी है।क्या क्या छुपाऊं तुमसे तुम्हारी तो मेरे झुमके को देख के बहकती जवानी है।।घाघरा चोली पहनू तो सीने पर तुम्हारी नजर टिकती है,पीछे से देखो तो मेरे back पर तेरी आंखे सटती है ।।केश खोल के रखूं तो वो भी बेहयाई है।क्या करेतेरी निगाहों मे समायी काम परछाई है।।हाथो को कगंन से ढक लूं चेहरे पर घुंघट का परदा रख लूंकिसी की जागीर हूं दिखाने के लिए अपनी मांग भरलूं।।पर तुम्हे क्या परवाह मैं किसकी बेटी किसकी पत्नी किसकी बहन हूं।तुम्हारे लिए तो बस तुम्हारी वासना को मिलने वाला चयन हूं।।सिर से पांव के नख तक को छुपा लूंगी तो भी कुछ नहीं बदलेगा,तेरी वासना का भूजंग तो नया बहाना बनकर के हमें डस लेगा।। सोच बदलो …… नज़र बदलो,,,, देश बदलेगा

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