
हम अपनी उपज को ऐसा बनाए,
विकसित होते भावों को कहीं खोज लाए ।
सांसों का आना जाना क्या जीना कहलाता है, या फिर निस्वार्थ कार्य सच्चा जीवन कहलाता है। बढते हम नित्य निरंतर, ओर काया का भार ढोते हैं।
हम अपनी उपज को ऐसा बनाए,
विकसित होते भावों को कहीं खोज लाए ।
न थकने दें अपने कदमों,न लाचार हो अपने कर्मो से।
कर्म का बंधन ही तो काया का भार बढ़ाता है। सच्चे विचारों से तो व्यक्ति फूल जैसा हल्का हो जाता है ।
किसी के गुण दोषों को देखे बिना हि उसके लिए सच्चे सुख की प्रार्थना करें। प्रार्थना में ही वह बल है जो तुम्हारे जीवन को उन्मुक्त बनाता है।
सांसो को स्वच्छ बनाता है। व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ाता है।
तुम्हारे रोम-2 को पुलकित करके तुम्हारे अंदर आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है।
जिसे हर जगह खोजकर तुम हार जाते हों वही प्रयास प्रार्थना के द्वारा फलीभूत हो कर तुम्हारे भीतर समा जाता है और आनंद और शांति का अनुभव करवाता है।
पत्थर जैसे हृदय को भी मोम जैसा नरम बना देता है। प्रार्थना के बल का अहसास हमारे अन्तःकरण को शुद्ध बनाता है।
पुलकित होकर हमारे द्वारा हो जाते हैं अनेक ऐसे सेवा कार्य जिसके द्वारा ओरों के जीवन में भी सुख के द्वारा खुल जाते हैं।
वही आनंद तो हमें सभी को देने की कोशिश करनी चाहिए।
जब हमारे कार्यों से किसी को संतुष्टि का भाव मिलेगा वही तो हमारा सच्चा सुख बनकर हमसे आलिंगन करेगा।
हमें कभी भी कहीं किसी दौड़ में शामिल नहीं होना होगा।
जीवन एक दौड़ नहीं, यह तो वह शांति है जिसकी रक्षा करते हुए हमें सत्यकर्मों के पथ पर
बढ़ना है।
यह तो अन्दर से बाहर की यात्रा है जो हमें इन सांसो के
साथ पूरी करनी है।
भौतिक सुखों का आकर्षण हमें कभी आत्मसंतुष्ट प्रदान नहीं करा सकता।अपितु हमारे दुःखों को बढ़ाता ही है। शारीरिक सुखों को तो देता है, अपनी उपयोगिता को भी बताता है। लेकिन हमारे अंतः करण को झकझोरता भी है अधिक पाने की लालसा को बढ़ाता है।
भौतिक सुखों के साथ -2 अन्तः करण की पवित्रता भी आवश्यक है।
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है यह सच है।
लेकिन आवश्यकताएं कहीं हमें गर्त की ओर न ले जाए।
इसका हमें हमेशा ध्यान रखना होगा।
सतर्क रहना होगा हमें हमारी सोच के प्रति और कार्यों के प्रति।
कभी-2 मन के भाव उत्तेजित हो कर हमें विनाश की ओर ले जाते हैं ।जिससे पूरा जीवन ही पतन की ओर जाने लगता है।
जब तक आत्मसंतुष्टि का भाव हमारे अंदर जागृत नहीं होगा तब तक हमारा जीवन भी अच्छा नहीं हो सकता।
अच्छे जीवन के लिए मन के अंदर संतुष्टि का होना आवश्यक है लेकिन स्वयं को उर्जावान बनाते हुए हमें अनके सद्कार्यों को भी करते रहना चाहिए।
निष्क्रिय होकर बैठना कभी आत्मसंतुष्टि प्रदान नहीं
करता है।
बल्कि हमें रुग्ण ही बनाता है।
हमें निष्क्रिय न बनते हुए अपने कर्म पथ पर बढ़ते जाना है ताकि हम स्वयं के साथ-2 परिवार और समाज को सुदृढ़ बना सके।
यह भाव जब हमारे अंदर विकसित होगें तब हम आत्मसंतुष्टि का अनुभव करेंगे।
ऋतु गर्ग,सिलिगुड़ी,पश्चिम बंगाल
स्वरचित, मौलिक
gargritu0101@gmail.com