इतरा रहा था मैं पानी में देख कर अपना अकस , और मन ही ये सोच ख़ुश हो रहा था कि कितना handsome है ये शकस !
किसी राही ने एक कंकड़ फेंक कर बदल दिया मेरा मंज़र , ऐसा लगा कि जैसे किसी ने मेरे सीने में भोंप दिया हो ख़ंजर , कुछ ऐसा हुआ फिर मुझ पे असर !
सोचो तो एक परछाईं को देख इतना इतना इतरा रहा था मैं, और मन ही मन फूला ना समा रहा था मैं ।
एक मामूली से कंकड़ ने मेरे इस ख़याल को कर दिया भंग , बिलकुल ऐसे ही वक़्त के साथ बदल जाते हैं जीवन के रंग और ढंग ।
एक छोटे से पत्थर ने मेरे अकस ने कर दिया था चूर चूर , और मुझे अपने अकस पर गर्व होने लगा था भरपूर !
दोस्तो , मेहेरबानो , ज़िंदगी में हम अपने आप पर ना जाने क्यूँ इतना इतराते रहते हैं , क्यूँ हम अपने रूप को देख इतना भाव खाते रहते हैं ?
ये चेहरा , ये रूप , ये सब अस्थाई है , एक कंकड़ भी इसे मिटा सकता है और आपको वास्तविकता के समक्ष ला सकता है ।
नाम गुम जाएगा , चेहरा भी बदल जाएगा , शायद अगर किसी चीज़ से आपकी पहचान रहेगी तो वो है आपकी आवाज़ , तो हमेशा मधुर वाणी बोलिए , फिर निस्सन्देह आपकी ज़िंदगी में होगा ख़ुशियों का आग़ाज़ !
साथियो , मीठे बोल बोलो और जिंदगानियों में प्यार , प्रेम और स्नेह का शहद घोलो !
कवि——निरेन कुमार सचदेवा।
Posted inshayari