बचपन की मेरी मोहब्बत थी-“डॉ सुलक्षणा अहलावत”

बचपन की मेरी मोहब्बत थी,
मेरे लिए खुदा की इबादत थी।

जुदा हुए बिना बेवफ़ाई किये,
कुछ इस तरह आई कयामत थी।

बड़ी पाक मोहब्बत थी हमारी,
ना ही मोहब्बत में मिलावट थी।

बिछड़े भी तो इस कद्र थे हम,
दिल पर यादों की सिलवट थी।

फिर मिले भी तो किस मोड़ पर,
जब घर में शादी की सजावट थी।

मन में घर कर गयी गलतफहमी,
मोहब्बत टूटने की ये आहट थी।

दिन रात दुआ की मिलने की,
मिले जब हम, मिली राहत थी।

गलतफहमियाँ दूर की बैठ कर,
पूरी हुई मेरे मन की चाहत थी।

उसके बिना ऐसे लगने लगा था,
जैसे सिर से छीन गयी छत थी।

रिश्तों की जंजीरों में जकड़ी हूँ,
वरना करनी मैंने बगावत थी।

अब सुलक्षणा तड़पती रहती हूँ मैं,
सोचकर खराब मेरी ही किस्मत थी।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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