संस्मरण-“विकास अग्रवाल बिंदल”

अनन्य भाव से माँ शारदे को अनंत नमन और धन्यवाद

          संस्मरण
        चाय-कॉफी 

जब मैं सरस्वती शिशु मंदिर, जहाँगीराबाद , भोपाल में पढ़ता था, बात उस समय की है और उस समय मैं सातवीं कक्षा में था।
हमारे विद्यालय में सभी अध्यापकों को आचार्य जी कहकर बुलाया जाता था।
हमारे गणित के आचार्य जी ओझा जी और संस्कृत के आचार्य जी राकेश शर्मा जी रहे हैं।

विद्यालय में सभी छात्र विद्यार्थी छात्राओं को दीदी कहकर बुलाया करते थे। जिससे हम छात्रों में छात्राओं को बहन स्वरूप देखने की आदत लग गई और हम सभी में भाई-बहन वाली मित्रता हो गई थी।

नवंबर-दिसंबर में सातवीं और आठवीं कक्षा की अर्द्धवार्षिक परीक्षा होने के बाद विद्यालय से सातवीं और आठवीं कक्षाओं के विद्यार्थियों को जनवरी माह में राजस्थान भ्रमण के लिए ले जाने की सूचना दी गई।

जिसमें हमारे दोनों आचार्य जी और बहुत सारे सहपाठी राजस्थान भ्रमण करने के लिए गए थे।
इस दौरान हम सभी छात्र-छात्राओं को जयपुर ( गुलाबी शहर ) में हवामहल, राजमंदिर सिनेमा और कई ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करवाया गया।

एक दिन हम सभी जयपुर का किला देखने के लिए गए हुए थे और जब वहाँ पर सभी छात्र-छात्राएँ चाय या कॉफी पी रहे थे, तब हमारे ओझा आचार्य जी ने अपने लिए लस्सी बुलवाई। वहाँ पर किला घूमकर सभी थक गए थे, इसलिए थकान उतारने के लिए चाय या कॉफी पी रहे थे, लेकिन जब ओझा आचार्य जी ने लस्सी बुलवाई।

तब मैंने उनसे पूछा-

विकास – “आचार्य जी, आप चाय या कॉफी न पीकर लस्सी क्यों पी रहे हैं ?? जबकि चाय या कॉफी पीने से हमारे शरीर की थकावट दूर हो जाती है।”

ओझा आचार्य जी – “विकास, मैंने चाय और कॉफी पीना छोड़ रखा है और मैं तो यह चाहता हूँ, कि मेरे सभी प्रिय विद्यार्थी भी चाय और कॉफी न पिया करें।”

विकास – “आचार्य जी, आपने चाय या कॉफी पीना क्यों छोड़ दिया है ??”

आचार्य जी – “विकास, चाय और कॉफी में कैफ़ीन होता है और इसी वजह से चाय या कॉफी की लत (आदत) लग जाती है, जो शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी कमजोर बनाती है, क्योंकि जब तक चाय या कॉफी नहीं मिलती है, तब तक दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती है। और एक बात यह भी होती है, कि घर से बाहर रहने पर चाय या कॉफी दिन भर में चार-पाँच से भी ज्यादा हो जाती हैं, जिससे भूख लगना कम हो जाता है।”

“आज सुबह से आप सभी छात्र-छात्राओं की यह तीसरी चाय या कॉफी है, जबकि अभी तो सिर्फ दो बजे हैं और थोड़ी देर बाद भोजन करना है, लेकिन देखना, आप सभी को भोजन करने के समय पर भूख ही नहीं लगेगी।”

और जब हम सभी किले से नीचे आ गए और भोजन करने के लिए भोजनालय में गए। तब वाकई में हम सभी छात्र-छात्राओं को भूख नहीं लग रही थी, जबकि इतना चलने के बाद तो बहुत तेज भूख लगना चाहिए था।

उस समय मुझे ओझा आचार्य जी की बातों में सच्चाई दिखाई दी और उस दिन आचार्य जी के शब्द जाने मेरे मन में क्या असर कर गये, कि मैंने उसी दिन से चाय और कॉफी पीना छोड़ दिया है।
आज उस बात को हुए लगभग पच्चीस वर्ष हो गए हैं, लेकिन आज भी मैं चाय और कॉफी नहीं पीता हूँ। और कभी जरुरत भी महसूस नहीं होती है और न ही चाय या कॉफी पीने की कोई इच्छा होती है। कभी-कभी यूँ ही खाली बैठे-बैठे सोचता हूँ, कि अगर उस दिन चाय और कॉफी पीना छोड़ने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आज हर दिन लगभग चार-पाँच चाय या कॉफी मैं भी पी रहा होता .. क्योंकि मेरे कार्यक्षेत्र में मेरे सभी मित्रगण हर दिन मुझे चाय या कॉफी पिलाने का प्रयास करते ही रहते हैं।

मासूम बाल मन पर अपने बड़े-बुजुर्गों की बातों का कितना गहरा असर होता है, यह बातें आज जब सोचने में आती हैं, तो लगता है, कि कोई एक पल ही होता है, जब हम और आप अपने जीवन में कोई ठोस निर्णय ले लेते हैं और फिर उस निर्णय को जीवन भर निभाना आपकी आदत बन जाती है, जो आपकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाता है।

मेरे जीवन में एक अच्छी आदत का बीज बोने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ओझा आचार्य जी

आभार और धन्यवाद

©️®️ विकास अग्रवाल बिंदल , भोपाल

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