जनता ने कस ली कमर, अपना आप सँभाल।
आँखों के डोरे हुए, देखो कैसे लाल।।
सत्य सनातन पर उठी, उँगली तनिक जघन्य।
खूनी पंजा दिख रहा, टूटा पड़ा निढाल।।
बहिष्कार कर राम का, हुए विधर्मी धन्य।
नहीं दिख रहा देश जो, खाने लगा उबाल।।
उड़ते-उड़ते उड़ गया, जमा रहा जो रंग।
जागी जनता देश की, खुली दुरंगी चाल।।
ठप्प हो गया वोट का, काला कारोबार।
ऊँच-नीच में बाँटकर, करते रहे कमाल।।
सारी चालें चुक गईं, उखड़े तंबू-बाँस।
लेने के देने पड़े, ऎसा मचा बवाल।।
हाथी अपनी चाल पर, चला जा रहा मस्त।
विवश भोंकते, खीझते, पागल श्वान-शृगाल।।
—डाॅ०अनिल गहलौत