सूख गया है हृदय स्रोत वह
सूखा आज मन का रसा है ।
अब ना स्नेहिल दृष्टि तुम्हारी;
ना ऑखों में प्यार बसा है।।
वो भी दिन था, मुझ देखे बिन
इक पल तुम ना रह पाते थे।
चलते-चलते किसी – राह में
मिलन-स्वप्न में खो जाते थे।
वो ‘प्रेमिल-राहें’ तुम भूली…
ना दर्शन का आज नशा है।
अब ना स्नेहिल दृष्टि तुम्हारी
ना ऑखों में प्यार बसा है।।
अपलक कभी ऑख में ऑखें;
बीती थी बातों में रातें।
ना भुजबन्धों का अन्त कभी;
निद्रित-नयन सॉस में साॅसे।
वो काल-परिस्थिति बीत गई..
तुम ना जानो कौन दशा है।
अब ना स्नेहिल दृष्टि तुम्हारी;
ना ऑखों में प्यार बसा है।
कैसे दिन में याद मिटाऊॅ;
कैसे रातों को समझाऊॅ!
बदल चुका है वो जग सारा;
अपने को कैसे बतलाऊॅ!
ना जानू कि ‘इस-जीवन’ में…
कौन रीति ने तुम्हें कसा है।
अब ना स्नेहिल दृष्टि तुम्हारी
ना ऑखों में प्यार बसा है।।
धवल-मेघ के चॉद रहे तुम;
गगन-चॉदनी बरस रही थी!
महारास के प्रणय-काल में-
रात सुहानी महक रही थी!
खुले केश में हॅसती-छवि की-
‘मौन-सर्पिणी’ आज डसा है!
अब ना स्नेहिल दृष्टि तुम्हारी;
ना ऑखों में प्यार बसा है।।
———————– बृजेश आनन्द राय, जौनपुर.