सूरज देख लिया हो जिसने, उसे न सोहें चाँद-सितारे।
राम-रसायन के आगे हैं, फीके अन्य रसायन सारे।।
छोड़-छाड़ सब दुनियादारी, पागल बने राम-धुनि में ही।
बस्ती-बस्ती गाते-गाते, चले जा रहे कुछ बंजारे।
डटा रहा आँधी में जमकर, रहा काँपता नहीं बुझा पर।
ऎसा शूरवीर दीपक ही, दे सकता सुस्थिर उजियारे।।
जल में कमल विरल ज्यों जल से, हो मन यों निर्लिप्त कर्मरत।
घटित-अनघटित जीवन के सब, दूर किनारे खड़ा निहारे।
लिपटे रहते सर्प विषैले, नहीं व्यापता चंदन को विष।
तजो क्रोध मॆं शीतलता मत, रहो शांत-मन धीरज धारे।।
—-डाॅ०अनिल गहलौत