स्वयं प्रकाशी-“डाॅ०अनिल गहलौत”

स्वयं प्रकाशी, घट-घट-वासी, मुदमय मंगलकारी राम।
सत-अभिलाषी, असत विनाशी, असुरों पर नित भारी राम।।

मर्यादा-पुरुषोत्तम, त्यागी, सत्पथगामी, व्रती अनन्य।
मानवधर्मी, समतापोषी, दिव्य पुरुष अवतारी राम।।

संत-हृदय में करें वास प्रभु, दुष्ट हृदय से रहते दूर।
कृपावंत भक्तों के रक्षक, निश्छल प्रेम-पुजारी राम।।

है राक्षस-समूह अकुलाया, किंकर्तव्यविमूढ़ हताश।
धवस्त दुष्ट मनसूबे सारे, बैठे उच्च अटारी राम।।

सदियाँ लगीं, फली तब आशा, पस्त हुआ आसुरी विरोध।
आई वह शुभ घड़ी प्रतीक्षित, लौटे अवध-विहारी राम।।
—-डाॅ०अनिल गहलौत

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