
नैनों की पिचकारी हो,और प्रीत का हो रंग
अरमानों की होली खेलूं,फागुन में पिया के संग।
गोरे_गोरे गाल पे मल दूं ,नीले,पीले,हरे,गुलाल
चाहत से मन को रंगने का,सीखूं साजन से ढंग।
जग की सुधबुध खो जाए,बस रहें प्रीतम याद न कोई बंधन न मोह कोई,रहे सदा राधाकृष्ण सा संग।
टेसू से श्रृंगार करूं,हो महुआ का मधुमास
प्रीतम डालें एक नजर,तो खिल जाए मेरा अंग।
जीवन में नूतन रंग भरूं, जागा मन में उल्लास
कर डालूं हाल ए दिल बयां, पी कर मैं भंग ।
नाच रहे हैं मोर_पपीहे,बहे बसंती बयार
सांसों में सैलाब उठा है,छाया है ऐसा उमंग।
रजनी प्रभा
बहुत ही अच्छा लिखा आपने आजकी बेस्ट रचना
रजनी जी ने होली के लिए बहुत ही सुंदर रचना प्रस्तुत किया गया है इन्हें अभिनंदन प्रदान करते हैं
कवि लेखक अनुवादक, सामाजिक कार्यकर्ता