आज बहुत गुस्से में थी श्रीमती जी -“डॉ सुलक्षणा अहलावत”

आज बहुत गुस्से में थी श्रीमती जी,
आगे से बोल पड़ा मारी गयी मति थी।

मुँह से बोली नहीं बेलन फेंक कर मारा,
फेंके गए बेलन की 150 की गति थी।

मैं बाल बाल बचा उस बेलन की मार से,
इतने में कटोरी मारी जो पास में रखी थी।

पास जाकर बोला प्रिये शांत हो जाओ,
आज मेरी खैर नहीं मुझे भी ये जची थी।

गुस्से में वो चिल्लाई जहन्नुम में जाओ,
तुमसे शादी करना ही मेरी गलती थी।

मैं बोला जान मेरी, गुस्से में क्यों हो तुम,
क्या आज नाश्ते में हरी मिर्च चखी थी।

आज से पहले तो इतनी क्रोधित नहीं हुई,
बोलो आज तुम पर ये चण्डी कैसे चढ़ी थी।

बोली तुम कभी नहीं सुनते हो मेरी बात,
बस पड़ोसनों की देख ऐश मैं जली थी।

गुस्से में आपा खो कर ये सब कर दिया,
माफ़ी दे दो मुझे कटोरी आपको लगी थी।

सोचा हर रोज इसकी सुनने में ही फायदा है,
बड़ी मुश्किल से प्यारे तेरी जान बची थी।

धीरे से आई लव यू कह कर मना लिया,
साँस में साँस आया जब सुलक्षणा हँसी थी।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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