
रब ने इजात किया था पैसा , इंसानों की सहूलियत के लिए, जीने का एक साधन ।
लेकिन दुनिया वाले तो इसे पूजने लगे , ये देख अब ख़ुद परेशान है भगवन ।
क्यूँ ऐसा लालची हो गया है संसार , वास्तविकता जानना चाहते हो तो सुनो , स्वयं ईश्वर का अब हम बाशिंदों पर से उठ चुका है ऐतबार !
सिक्कों की झनकार हर इंसान को कुछ इस तरह भाती है , कि उसके सामने हर शय फीकी नज़र आती है ।
दिल ही दिल में तो मौला भी ये मानने की तैयार नहीं कि ये दौलत ले आएगी एक ऐसी क़यामत !
तराज़ू के एक पलड़े में रखो रिश्ते नाते और दूसरे पलड़े में रखो पैसा , तो निस्सन्देह पैसे वाला पलड़ा होगा भारी !
पैसा तो बन गया है एक ख़ुमारी , ज़्यादा पैसा पाने की सब को लग चुकी है बीमारी ।
सिर्फ़ इतना ही नहीं , पैसे के अंधे बाज़ार में ईमान , ज़मीर तक लगे हैं बिकने , अब हमें इन इंसानों के असली हाव भाव लगे हैं दिखने !
पैसे के कारण होता है जिस्मों का व्यापार , हर चीज़ का अब लगने लगा है बाज़ार ।
जेब में नोट हैं तो बताओ कि तुम क्या ख़रीदना चाहोगे , हर चीज़ है बिकाऊ , पैसा है तो हर चीज़ कर सकते हैं आप हासिल ।
परम पिता परमेश्वर ने कभी भी ऐसा सोचा ना था कि इस तरह का विकराल रूप लेकर पैसा हो जाएगा इंसानों की ज़िंदगी में शामिल ।
शर्म की बात है कि अब जान की भी नहीं है कोई अहमियत , कोई क़ीमत !
आज की दुनिया में इसे “सुपारी” कहते हैं , इधर पैसा फेंको और उधर किसी की छाती पर चल जाएगी गोली !
दुश्मनों के साथ कुछ इस तरह से खेल रहें हैं ख़ून की होली ।
जिन माँ बाप ने जन्म दिया , पाला पोसा , बड़ा किया , आजकल की औलाद ये सोचती है कि उन पर भी पैसा खर्चना है फ़िज़ूल , है व्यर्थ , ये है घोर पाप , घोर अनर्थ ।
आजकल की संतान को बस माँ बाप के हाथों लिखी वसीयत की हैं चाहत ।
और इन नामुराद पन्नों पर दस्तखत करते ही , माँ बाप की आ जाती है शामत ।
बहुत जल्द उन्हें घर से बाहर निकलने का बहू बेटे का सरकारी फ़रमान , चुल्लु भर पानी में डूब मर तू इंसान !
अब तो पैसा ही आदर्श है ,दीन है , पैसा है तो हैं ऐश ओ आराम , है हैसियत ।
बहुत ही दग़ाबाज़ और मौक़ापरस्त है आज की दुनिया , यही है आज की हक़ीक़त ।
पैसा बहुत ज़रूरी है जीने के लिए , इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता ।
लेकिन ये पैसा तो बन जाता है अय्याशियों का कारण , ऊँच नीच का सबब , पता नहीं कि आख़िर ये पैसा है क्या चाहता ?
इस पैसे ने कई घरों को दिया है उजाड़ ,शराब पीना , वेश्यावृत्ति ,ये सब पैसे की ही तो देन है , ऐ काश कि रचेता ने ना बनाई होती ये दौलत , तो शायद आज इस धरती की मुक्तलिफ होती सूरत !
लेखक——निरेन कुमार सचदेवा।
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