मुझे तुम याद आते हो -“अंकित जैन”

मुझे तुम याद आते हो ,
पेड़ो के पत्तो में, मधु के छत्तों मैं,
स्कूल मे बस्तों मैं, महंगे सस्तो में,
कठिन सरल रस्तों मैं, ग्रहो नक्षत्रों मे, तुम परिक्रमा लगाते हो
तुम याद आते हो,

खिलते फूलों मैं , नादानी मैं भूलों मैं, टहनियों मैं शूलों मैं, लहराते झूलों मैं, ऊल-ज़लूलो मैं जड़ो मैं मूलों मैं, तुम हवाओँ सा लहराते हो
तुम याद आते हो

कस्टियो किनारों मैं, पानी की फुहारों मैं, मोह्हबत के मुहानों मैं,
रंगों मैं बहारों मैं,छुपे बादलों आसमानों मैं ,सितारों मैं, बारिशों की फुहारों मैं, रेत दरिया पठारों मैं, अपनो के सहारों मैं तुम मुस्कुराते हो,
तुम याद आते हो,

तुम्हे पाने को भटकता हु,
मैं सर्द हवाओं मैं सिसकता हूँ,
बिखरे पन्नो सा किताबी आजकल बसुधा दिखता हूँ, तुम मौसमों की तरह आती और जाति हो,
तुम याद आती हो
तुम याद आती ही

अंकित जैन

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