इंसान जी रहा दहशत में

आज सर्वत्र
अपराध देख बढ़ते
इंसान जी रहा दहशत में
निकलते वक्त घर से
वह भर जा रहा दहशत से ।

सोचता कि
क्या पता
आज घर लौटूँगा कि नहीं ।
कुशल से।

कहीं बस में
तो कहीं ट्रेन में
तो कहीं राह में
होते देख भयानक अपराध
सच कहता हूँ
आज इंसान जी रहा दहशत में ।

आज न तो कानून से
न तो सजा से
न तो प्रशासन से
रुक रहा अपराध कहीं
अपराधी
स्कूल काॅलेज अस्पताल में
खुलेयाम कर रहे
जिस तिस का कत्ल
सरेआम लूट ले रहे
बेटी बहनों का आबरु
इनके खौफनाक अपराध से
सच कहता हूँ
आज हर इंसान
जी रहा दहशत में।

धर्मदेव सिंह

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