जो दिल से दिल की,बात ना होती
शायद यूं झूमकर,बरसात ना होती
यों दिल का दिल से,दिल ना मिलता
तो हसीं ख्वाबों से भरी रात ना होती
बोझिल हो जाते मुहब्बत के बिन सब
इन लम्हों की प्यारी ये सौगात ना होती
वो रात भर रहता,दीदार की चाह में
चांद की चकोर से,मुलाकात ना होती
परवाह करते ग़र दिल,जमाने की यूं
दिलों में धड़कने की खुराफात ना होती
डॉ विनोद कुमार शकुचंद्र