मौलिक सृजन.. विधा– पद्य/कविता कर्म कलम-कागज का ….

कलम कनक की भले नहीँ है ,
अक्षर असर तो ,फिर भी करेंगे ।

कागज करार भले ही करे न ,
मसि कसी तो, सब सार सरेंगे ।

पटल रजत जो, कभी मिला तो ,
पीड़ा तृण कण्टकों की हरेंगें ।

उम्मीद- पंख भले कोमल हो ,
लेखन से नभ परवाज उड़ेंगे ।

एक से मिल एक, ग्यारह बने तो ,
कदम चले, मंजिल पे जमेंगे ।

स्याह स्याही जो, कागज ढली तो,
ज्ञान के अगणित दीप जलेंगे ।

न मिले भले ,सम्मान सिक्कों के ,
लिख-लिख तब, कागज भी चलेंगें ।

शान हमारी जो, न कभी बनी तो ,
कलम की धार और तीक्ष्ण करेंगें।

दिलकश भावों को, सहेज सके हो,
कलमकार बन कागज तरेंगे ।

अक्स समाज का लफ़्ज बने जो,
जन के मन फिर, न कभी डरेंगें ।

अन्याय, अनीति, अपमान अवक्षय ,
राम-शर की जन-ज्वाला जलेँगेँ ।

वाणी वीर विपुल सी ,न सही ,
स्वर-समय, सजा साज सुनेंगें ।

कमजोर, कमसिन, कमतर, कर भी,
देकर जोश जोर-जोर भरेंगें ।

तीक्ष्ण-तीर, तरकश तेजस तो ,
तेज थार-तट,तिनपार तरेंगें ।

प्रेम-पीर ,प्रकृति पुर पूरण का ,
प्राण-प्रणय ,प्रण पर पुरेंगे ।

जलद जो, जम-जमकर झमके तो ,
मन मयूर मदमस्त उड़ेंगें।

लेखन-लक्ष्य लेकर, लोह- लहके ,
लिखकर लेख उल्लेख लिखेंगें ।

रंग-रंग , रंग रहे संस्कृति संग,
पावन-होली के रंगों रंगेंगें ।

काया-खाक ,कर्म-तत्व बनाकर,
आत्मा अजस्र कण-कण में रमेंगें ।

आरती माँ ,भारत-भू की गाकर ,
भारत-भाग्य विधाता भजेंगें ।

 डी कुमार –अजस्र , बून्दी , राजस्थान)

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