साहिर लुधियानवी

लब पे पाबंदी तो है एहसास पर पहरा तो है
फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है
ख़ून-ए-आ’दा से न हो ख़ून-ए-शहीदाँ ही से हो

कुछ न कुछ इस दौर में रंग-ए-चमन निखरा तो है
अपनी ग़ैरत बेच डालें अपना मस्लक छोड़ दें

रहनुमाओं में भी कुछ लोगों का ये मंशा तो है
है जिन्हें सब से ज़ियादा दा’वा-ए-हुब्बुल-वतन

आज उन की वज्ह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है
बुझ रहे हैं एक इक कर के अक़ीदों के दिए

इस अँधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है
झूट क्यूँ बोलें फ़रोग़-ए-मस्लहत के नाम पर

ज़िंदगी प्यारी सही लेकिन हमें मरना तो है.

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