एक वृद्धाश्रम में दो समधन मिलीं , कौन किसे दोष दे , शर्मा गयीं , कुछ भी बोल नहीं पाईं , एक दूसरे के सामने अपना दिल खोल नहीं पाईं ।
कश्मकश ये थी कि दोनो ही अपनी अपनी नज़र में अपराधी थीं , शायद इसीलिए आज इस वृद्धाश्रम में अब क़ैदी थीं ।
ख़ैर , दोनो बात करने लगीं और कुछ दोष कर्मों को देने लगीं ।
भावुक हो रहा हूँ, आँखें हो रहीं हैं नम , कैसी नालायक औलाद है जो नहीं देख पाते अपने सगे माँ बाप का दर्द , नहीं महसूस कर पाते उनका दुःख और ग़म ।
अपनी औलाद को हमेशा देना अच्छे संस्कार , उनके दिलों में पनपना चाहिए अपनों के लिए प्यार ।
ख़ैर , बच्चे बड़े होकर अपने माँ बाप से कैसा सलूक करते हैं, ये कोई भी नहीं कह सकता।
लेकिन अपनी औलाद से दूर होने का ग़म कोई भी आसानी से नहीं सह सकता ।
कहाँ लुप्त हो गयी है शर्म , क्या आजकल के बच्चों का ज़मीर मर चुका है , नहीं है ज़िंदा !
ये सुन कर शर्मसार होगा हर बाशिंदा !
अक्सर अगर माँ बाप को घर से निकाला जाता है , तो उसका दोष कहें या श्रेय , बहू को ही दिया जाता है ।
हैरानगी की बात है , क्या बेटे का अपने माँ बाप से नहीं कोई रिश्ता नाता है ?
लानत है ऐसी औलाद पर, इन्हें तो डूब मरना चाहिए , माँ बाप की उम्मीदों को जानना और समझना चाहिए ।
दोनो वृद्ध औरतें फिर ख़ूब रोईं , एक जैसी थी दोनो की दास्तान , दोनो ही थीं बहुत निराश और परेशान ।
मेरे अज़ीज़ो , माँ बाप तो क्या ही कर सकते हैं , उनकी क़िस्मत पर भी शायद निर्भर करता है कि उनके बच्चे बड़े होकर कैसे करते हैं उन से भर्ताव ।
फिर भी , आप सब आप बच्चों को बहुत प्यार देना , और उन्हें संस्कारी ज़रूर बनाना , यही है मेरा सुझाव !
कवि——नीरेन कुमार सचदेवा।
I literally broke down while writing these few lines .
How can anyone send their parents to old age homes I wonder , and then how can they ever live in peace ?
