विजय नाद

रक्तबीज बन चुके आनासागर के उद्धार के लिए अदिति जी जैसी देवी को लेना होगा अवतार

और लीजिए साहब, आनासागर फिर उफनकर सड़क पर आ गया।

कल प्रेम प्रकाश आश्रम, चौरसिया बास रोड, वैशाली नगर, अजमेर में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज द्वारा श्रीमद् देवी भागवत कथा संपन्न हुई। कथा में रक्तबीज का प्रसंग आया — वह राक्षस जिसके रक्त की हर बूंद से नए राक्षस जन्म लेते थे। देवी ने अवतार लेकर उसके रक्त को खप्पर में भर लिया और उसका अंत कर दिया।

आज आनासागर वही रक्तबीज बन चुका है। और इस रक्तबीज को कोई और नहीं, स्पीकर साहब और कलक्टर साहब पाल रहे हैं। जितना उसे दबाने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही उफान मारकर सड़कों पर बह निकलता है। 18 जुलाई की बाढ़ का जख्म अजमेर अभी भूल भी नहीं पाया था कि फिर से वही दृश्य सामने है।

क्यों? क्योंकि प्रशासन और राजनीति की सांठगांठ ने आनासागर के पेट में अतिक्रमणों का ज़हर घोल दिया है। स्मार्ट सिटी के नाम पर हुई बेतहाशा खुदाई और ठेकेदारी लूट ने इस तालाब को मौत की खाई में धकेल दिया। स्पीकर साहब का मंच से बयान देना कि “आनासागर का स्थायी समाधान होगा” और कलक्टर साहब का “कंट्रोल में है” वाला रटा–रटाया झूठ बोलना, दोनों मिलकर इस शहर की जनता की आँखों में धूल झोंक रहे हैं।

18 जुलाई की भयावह बाढ़ के बाद पूरे शहर को उम्मीद थी कि प्रशासन तालाब की सफाई, नालों की चौड़ाई बढ़ाने और भराव क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने जैसे ठोस कदम उठाएगा। लेकिन हुआ क्या? नाला वही जाम पड़ा है, भराव क्षेत्र पर निर्माण जस का तस खड़े हैं, और सफाई महज़ कागजों में पूरी कर दी गई। यही लापरवाही फिर आनासागर के उफान का कारण बनी।

उस बाढ़ ने अजमेर की नब्ज हिला दी थी। घंटों बिजली गुल रही, मोहल्लों के मोहल्ले पानी में डूब गए, घरों में फर्नीचर–किताबें तक तैर गईं, स्कूल–कॉलेज बंद करने पड़े, बाज़ार चौपट हो गया और छोटे दुकानदारों का माल पूरी तरह बर्बाद हो गया। परिवारों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। लेकिन दुख की बात यह है कि जनता की इन त्रासदियों को नेताओं ने महज़ “प्राकृतिक आपदा” कहकर टाल दिया, जबकि असली जिम्मेदार तो यही लापरवाह तंत्र था।

बचपन में सुना था कि आनासागर इतना गहरा है कि सात हाथी खड़े कर दो तो भी डूब जाएंगे। लेकिन 35 साल पहले जब सूखे हुए तालाब पर साइकिल दौड़ी, तभी समझ आ गया था कि ये गहराई अब किस्सों में ही बची है। आज तो हालत यह है कि तालाब का सीना कुतरकर उस पर मॉल, कॉलोनी और होटल खड़े कर दिए गए हैं।

अब सवाल है — क्या सिर्फ गेट खोलकर पानी निकाल देने से समस्या हल हो जाएगी? बिल्कुल नहीं। असली इलाज है अतिक्रमण का नाश। लेकिन इसके लिए चाहिए अदिति मेहता जैसी अधिकारी, जिन्होंने दरगाह के अतिक्रमण को जड़ से उखाड़ फेंका था। वो अकेली महिला थीं, मगर साहस में पूरे शहर की मर्दानगी पर भारी पड़ीं।

आज आनासागर उसी देवी को पुकार कर रहा है। पर अफसोस, अजमेर को न तो जागरूक नागरिक मिले और न ही निडर अफसर। यहाँ तो सबको सिर्फ कुर्सी और कमीशन प्यारा है। सवाल यही है — क्या अजमेर को फिर अदिति मेहता जैसी लौह महिला मिलेगी, या फिर स्पीकर साहब और कलक्टर की जोड़ियों के ढकोसले में आनासागर साल–दर–साल तड़पता रहेगा?

 विजय कुमार शर्मा
प्रधान संपादक – संस्कार न्यूज़

 9610012000

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