पितर हमारे अपने है,
हम तो बच्चे उनके है,
वो है माला के धागे से,
हम तो कच्चे मनके है।
पितर तृप्त तब जब,
सुखी अनुज अग्रज है।
हम उनके ही है अंश,
वो ही हमारे वंशज हैं।
पितरों ने दिया जो कुछ,
उनको करना अर्पण है।
भोजन सम्मान समर्पण,
उनको करना तर्पण है।
पितर देते संस्कार ऐसे,
रीत रिवाज सीखे धर्म है।
उन्हीं के अशीष से हम,
सफल करते सारे कर्म है।
पितरों को मिले शान्ती,
श्रृद्धा पुष्प अर्पित करते हैं।
नीलम श्राद्ध करके मनाए,
नमन भाव अर्पित करते हैं।
नीलम जैन
बाड़मेर राजस्थान