कितना वीराना सा है ये तेरा शहर
ईट पत्थर की नगरी,नहीं कोई घर
उम्र कटती है सबकी सुबह _शाम में
जीते है किश्तों में पहर दो पहर
कितना,,,,
कल वो पगली जो नल पे नहाने लगी
तो सारी नजरें ही उसको सताने लगी
खूब पैसे कमाएं सबने उस रील पे
भटकती रह गई वो तो दर ब दर,,,
कितना वीराना सा है तुम्हारा शहर,,
मेरे पनघट की शोभा कभी देखना
दया,प्रेम,पूजा,समर्पण सभी सीखना
सबकी परवाह सबको ही रहती यहां
किसको मितली उठी,किसको आया है ज्वर,,,
कितना,,,
आज भी तुलसी चौरा सजाती है मां
करके बहाने बुआ को बुलाती है मां
शहरियों की होती है ऐसी तबीयत कहां
स्वार्थ ही स्वार्थ इनको तो आता नज़र ,,,
कितना वीराना,,,
बहुत ही सुंदर रजनी प्रभा जी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
Congratulation it’s very nice
उत्कृष्ट
उत्कृष्ट
दिल को छू लेने वाली रचना
दिल को छू लेने वाली रचना