मृतप्रायः थी धरा
विनाश का मंजर
चहुँओर था
कायनात की करामाती
कारगुजारी से
नवजीवन संचारित हुआ
कण-कण होते कंकर
भी शंकर-शंकर
होने लगे।
धीरे-धीरे प्रकृति
करने लगी श्रृंगार
रंग-बिरंगे फूलों से
घाटियाँ हुईं गुलजार
सरसराते झरनों का
मादक संगीत मन
मोहने लगा
नयनाभिराम प्रकृति
हुई
हवाओं में नशा
घुलने लगा।
डा.नीलम