
आप आओ तो सजा लें,
जिन्दगी की बहारें।
वक्त खुद का हम सजाएं,
तो यहीं होंगी बहारें।
दिल खुदी मिटने न दे तो,
ये सभी को ही सजाती।
प्यार से फिर हम सभी लें,
खूबसूरत सी बहारें।
देखती कुदरत हमारे,
प्यार के मंजर सदा ही,
ये जहां भी जानता है,
हैं उन्हीं से ही बहारें।
कौन कहता मुश्किलों से,
दिल गुजरता प्यार करके।
हो तसल्ली तो दिलों को,
कहकशां देती बहारें।
हूॅं कदरदां वक्त का मै,
वक्त में मेरी खुदाई,
साॅंस धड़कन को सजाती
ले चहल इनकी बहारें।
स्वरचित/मौलिक रचना।
एच. एस. चाहिल। बिलासपुर। (छ. ग.)