21वीं सदी में भी हमारे समाज में लड़कियों का स्वच्छंदविचारवादी होना गवारा नहीं।उसका अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेना जैसे किसी अनचाहे गुनाह को न्योता देने जैसा समझा जाता है और फिर सामाजिक रश्मों-रिवाजों का हवाला देकर बांध दिया जाता है किसी ऐसे शख्स के गले जिसे ना तो वह जानती है और ना ही वह उसे।और फिर कुंडली मिलान और ग्रह नक्षत्रों के शास्त्रीय मिलान के पश्चात एक-दूसरे विचार और परिवेश में पली-बढ़ी लड़की को अलग विचारधारा और परिवेश से जोड़ दिया जाता है।यह सोच कर कि ऐसे अद्भुत ग्रह_ नक्षत्र और कुंडली का योग तो संयोग से ही होता है।यह रिश्ता अवश्य ही कामयाब होगा। मगर सामान्यत: ऐसे रिश्ते में दो तरफा दीवार हमेशा खींची ही रहती है। जहां मन से ज्यादा शास्त्रीय मिलान जरूरी समझा जाता है। फिर अकर्षणरहित रिश्ते दोनों के लिए ही केवल बोझ बनकर रह जाता है।
’उर्मिला शिरीष’ द्वारा रचित पुस्तक खैरियत है हुजूर की कथावस्तु भी यही है। लेखिका ने एक नारी के मनोभाव और अपेक्षाओं के साथ_ साथ उसके संपूर्ण जीवन के घनावृत को बड़ी ही कुशलता और आकर्षण से प्रस्तुत करने की पुरजोर कोशिश की है।
जिस प्रकार एक सस्पेंस से उन्होंने कथा का आरंभ किया है उससे आरंभ से अंत तक कथा में रोचकता और आकर्षण बना रहता है और अनायास ही पाठक को अपने गहराई में उतारते चला जाता है। आलोच्य पुस्तक को पढ़ते वक्त ऐसा प्रतीत होता है मानो आंखों के आगे कोई चलचित्र चल रहा हो। सारे पात्र अपनी भूमिका में सटीक बैठतें हैं। संवादों के सफल संयोजन ने कथा में प्राण फूंक कर उन्हें जीवंतता प्रदान की हैl हां कहीं-कहीं कथा थोड़ी इतिवृतात्मकता की ओर अग्रसर होती दिखती जरूर है मगर अगले ही दृश्य में सफल संवाद _संयोजन उसे संभालता भी दिखता है।
उपन्यास की नायिका शुचिता पढ़_ लिखकर कुछ करना चाहती है मगर उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका विवाह मेडिकल की पढ़ाई कर रहे संजीव से कर दिया जाता है। एक संपन्न घराने की लड़की एक सामान्य परिवेश में वह तमाम तकलीफें झेलती है जो एक पति प्रेम से वंचित स्त्री के लिए आम बात है। माली हालत ठीक न होने पर उसकी मर्जी के बिना संजीव सुचिता के भाइयों के बिजनेस में भागीदार हो जाता है और पिता की मृत्यु के बाद वही भाई सब उसे उसका हक दिए बिना ही किनारा कर लेते हैं।इसके फ्लैशबैक में देश काल से परिचित कराती दो घटनाओं की चर्चा है जिनमें से एक है तत्काल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षाकर्मी द्वारा हत्या और दूसरी भोपाल में यूनियन कार्बाइड जो पेस्टिसाइड की अमेरिकन कंपनी में गैस लीक होने के कारण बड़ी संख्या में जनहानि का होना।हर बड़ी घटना के साथ-साथ छोटी-छोटी अंतर्घटनाए भी होती है जो समय समय पर अलग सावरूप धारण करती है।इस घटना से उपजे जाल फरोसी के कारोबार में मानसिक रूप से विकृत संजीव फंस जाता है और फिर इनकम टैक्स की रेड ,केस, जेल और शुचिता का संघर्ष यही दिखता है पूरी कथा में। जहां एक पुरुष,स्त्री पर लगे किसी भी इल्जाम को बिना जाने समझे उसे सच मान दरकिनार कर लेता है, वही शुचिता अपने पति पर लगे हर इल्जाम की तह तक जाती है जिसमे यौन शौषण भी एक होता है। 27 साल 4 माह 18 दिन के बाद अंतोगत्वा उसके पति को न्याय मिलता है। इससे हमारे समाज के न्याय व्यवस्था की मजबूती का पता चलता है।इसी क्रम में जेल के भीतर के परिवेश को भी बखूबी चित्रित किया गया है जहां एक तरफ तो लोगों को जघन्य अपराध करने से मनाही है जेल का भय है तो दूसरी तरफ से यह दिखाया गया है कि अगर किसी के पास पैसा है तो जेल के अंदर भी वो तमाम सुख सुविधाएं उपलब्ध है जो उसे बाहर में मिलते हैं। सभी अपने अपने चरित्र को बेदाग रखने के लिए शुचिता और संजीव से मुंह मोड़ चुके होते हैं परंतु शुचिता का आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प सब कुछ संभव कर ही डालता है जेल से बाहर आते ही संजीव शुचिता से लिपट जाता है और कहता है_ ’शुचिता मैं कहता था मैं निर्दोष हूं। एक तुम्हारा विश्वास ही था जो मैं वापस लौट सका हूं।’ और फिर दोनों पहली बार सप्रेम गले लगते हैं।
उपन्यास की कथावस्तु ऐसे धरातल पर बुनी गई है जिसमे वास्तविकता के बीज यथार्थ के साथ फलीभूत होते दिखते हैं,ये घटना कोई बड़ी बात नहीं।आम जनजीवन में हमारे समाज में ऐसी चीजों ने गहरे पैर जमाए हैं,परंतु जिस सरलता,सूक्ष्मता और सफल भावबोध के साथ लेखिका ने इसे प्रेषित किया है उनकी भाषाशैली,उनका शिल्पविधान और संवाद योजना काबिल ए तारीफ है।हिंदी साहित्य जगत की अनुपम कृति है ’खैरियत है हुजूर’
लेखिका के प्रभावी कथाशिल्प,वाक्य विन्यास,कुशल संवाद शैली और सफल पात्र संयोजना को देखते हुए यह सहज ही प्रतीत होता है ,कि साहित्य शिखर पर इनका परचम लहराना निश्चित है।हम इनके समृद्ध लेखनी के उज्ज्वल भिविष्य की कामना करते हुए इन्हें ढेरों शुभकामनाएं देते हैं।

Posted inArticles
