
चुनावी खेल
आया है नेताओं का खेल,
खेलने आएँगे ..आएंगे,,
ये जनता बेचारी,
हरदम जाती मारी।
चुनाव जब आता है तो ग़ले ये लगाते
मीठा_मीठा बोलते हैं और पास ये बैठाते।
ऐसा लगता है तब तो,
है बहुत बड़े हितकारी..,,।
आया है ,,,,,!
गली_गली घूमते हैं ये वोट की ख़ातिर,
जब वोट मिल जाते दिखते नहीं फिर शातिर
अब तो झोली फैलाकर,
बने हैं सब ही भिखारी,,,।
आया है ,,,,,,।
देश की सेवा का ये बनाते हैं बहाना,
जब टिकट कट जाए, झट दल बदल जाना।
इनको देश से क्या लेना,
बस हैं कुर्सी की बीमारी,,,,।
आया है ,,,,,,।
मंदिर_मस्जिद करके ये आपस में है लड़ाते,
जनता को ठग करके ख़ुद हैं ये मौज उड़ाते।
जनता ही पिसती हमेशा,
ये तो माल खाए सरकारी,,,,,।
आया है नेताओं का खेल,
खेलने आयेंगे,आयेंगे,,,,,।
✍️राजेंद्रार्यः
महेंद्रगढ़,हरियाणा
वाह वाह क्या बात कही अति सुन्दर प्रस्तुति आपकी