धरती माता का दर्द यही है,
रही अब मानवता नहीं है,
बिना सोचे प्लास्टिक फेंके,
यह भी तो एक जहर ही है.
प्लास्टिक बहुत ही घातक है,
नहीं इसमें कोई भी शक है,
बेजवान हो रहे हैं शिकार ,
पड़ता नहीं हमें कुछ फ़र्क है।
घूमते इस कालचक्र में फिर से,
हम तक आ रहा खतरे का तीर,
दूध में भी अब प्लास्टिक मीले,
जिससे हो रही बीमारी गंभीर।
जहर बनकर यह उभरता है,
जनवरों को नुक्सान करता है,
अनजाने में निगल जाते हैं वो,
फ़िर बाद में जानवर हड़पता है।
उदय झा