
धूप हमारे हिस्से की भी, हमें न मिली कभी।
रही न अपने अधिकारों की क्यों बिलबिली कभी??
आगे बढ़कर दिखलाते हम, कैसे जीवन में?
पैरों में रस्सी थी उसकी, गाँठ न ढिली कभी।।
आतताइयों का दुस्साहस, बढ़ता चला गया।
क्योंकि रहे चुप सहते सब कुछ, जीभ न हिली कभी।।
भूल हुई कोई ऐसी जो, भारी पड़ी बहुत।
एक बार मुरझाई फिर वह, कली न खिली कभी।।
लगा दहकने नेताजी का कमरा हीटर से।
फटी रजाई दीनू की तो गई न सिली कभी।
भूल हुई ऐसी कोई जो, भारी पड़ी बहुत।
एक बार मुरझाई फिर वह, कली न खिली कभी।।
वज्राघात सहन करता, आया नर युग-युग से।
किंतु मनुज से एक फूल की, चोट न झिली कभी।।
लिए हाथ की रेखा ऊँची, पहुँची महलों में।
झोपड़पट्टी वाली माँ की, थी लाड़िली कभी।।
—-डा०अनिल गहलौत~~
प्रयुक्त समांतक—
मिली, बिली, ढिली, हिली,
खिली, सिली डिली, खिली।