परम आदरणीय डॉ. हरिसिंह पाल जी,
मुख्य संपादक, ”नागरि संगम”।
सादर नमन

सर्वप्रथम नागरी लिपि परिषद से जोड़ने के लिए आपका और डॉ. शहाबुद्दीन नियाज़ शेख सर का हार्दिक आभार।
’नागरी संगम’का अप्रैल-जून 2023 तक पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।विशाखापट्टनम में आयोजित दो दिवसीय नागरी लिपि संगोष्ठी एवं कार्यशाला के पूर्ण विवरण ने इस पत्रिका को और भी आकर्षक बना दिया है। नागरी लिपि को जन_ जन तक पहुंचाने के इस मुहिम में भिन्न-भिन्न विद्वत जनो के आलेख ने नागरी लिपि को प्रतिष्ठित करने का ज्ञानवर्धक और उत्कृष्ट कार्य किया है। आप के संपादकीय में व्यक्त ’जहां चाह वहां राह’ की अदम्य आकांक्षाओं की पूर्ति फलीभूत होते देखने की प्रसन्नता स्पष्ट परिलक्षित होती है। देश_ विदेश में देवनागरी को स्थापित करने के क्रम में एक से एक विद्वत जनो और शुभचिंतकों की गरिमामई उपस्थिति ऑनलाइन और ऑफलाइन रही। आप के वक्तव्य से पूर्णत: सहमति रखते हुए मैं भी इस प्रश्न को बार-बार दोहराती हूं, कि 76 वर्ष हुए अंग्रेजों को भारत से खदेड़े हुए फिर भी जन _जन का कंठाहार अंग्रेजी क्यों? हमारी खुद की हिंदी भाषा में इतनी क्षमता है,कि वह वैश्विक स्तर पर अपने पांव पसार रही है।फिर इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में संदेह क्यों? इस विशेषांक में भिन्न-भिन्न आलेखों के सफल संयोजन और शोध युक्त सामग्री से शोधार्थियों के लिए यह अंक विशेष लाभकारी बन गया है। प्रोफेसर नीलू गुप्ता अमेरिका के ’काव्य सरिता’ में गोते लगाते हुए हमें देवनागरी की उत्पत्ति, इसका क्षेत्र, वर्णमाला की महत्ता, उच्चारण और लेखन प्रभाव के साथ-साथ इसे राष्ट्रभाषा बनाने का स्पष्ट आवाहन देखने को मिला।कम शब्दों में सफल प्रयास किया गया है।
प्रोफेसर भोलानाथ तिवारी की ’विरासत लेख’,’देवनागरी लिपि के गुण में देवनागरी के वैज्ञानिक महत्व’को स्पष्ट करने का उत्तम प्रयास किया गया है।नागरी लिपि और वर्तनी संबंधी त्रुटि के ऊपर ध्यान आकृष्ट करने की पुरजोर कोशिश की गई है। कहीं-कहीं प्रूफ रीडिंग की कमी दिखती है। जिस पर ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक लगता है। ’भारत के भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता में नागरी लिपि का योगदान’ नामक लेख में प्रोफेसर डॉ शशिकांत सावन ने देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, विकास से लेकर इसके चीन,जापान, ईरान और ईरान के बीच के तत्कालीन प्रदेश तथा मध्य एशिया तक के प्रभाव को भली भांति उजागर करने का प्रयत्न किया है। इन्होंने जो पाषाण युग,बौद्ध काल,सिंधु घाटी सभ्यता में हिंदी की महता को परिभाषित करने का उत्कृष्ट कार्य किया है,वो आज के शोधार्थियों के लिए निश्चित ही उपयोगी और ज्ञानवर्धक है। हिंदी की सांस्कृतिक और भावात्मक माता को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अनेकानेक शब्दों को प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार डॉक्टर पूर्ण सिंह डबास के’और डॉक्टर के पद्मिनी के ’आलेख भी वर्तमान परिदृश्य में हिंदी की महती भूमिका को स्पष्ट तौर पर परिलक्षित करती है। देवनागरी के बढ़ते प्रभाव और विश्व में इसके स्थान निर्धारण को समझने में यह लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्वयं को नागरी लिपि से एकीकृत करते हुए एस अनंत कृष्णन का आलेख ’नागरी_ हिंदी और मैं’ बहुत ही समसामयिक लगा। तमिल प्रदेश में हिंदी की नौकरी मिलना और उसके प्रचार_ प्रसार करने की चुनौती को अंगीकार करते हुए उनके द्वारा अहिंदी भाषी क्षेत्र में इसे ही अपनी उपलब्धि मानना हमारे लिए गौरव की बात है। जहां हम हिंदी क्षेत्र के होते हुए भी अंग्रेजी के पास से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, ऐसे में अनंत कृष्णन हमारे प्रेरणा स्रोत है!डॉक्टर राजेंद्र मिलन लिखित ’नागरी लिपि ही बनेगी भारतीय भाषाओं की संजीवनी’ मन को मोहित करती है!राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में राष्ट्रभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के प्रस्ताव का भविष्य के लिए निश्चित तौर पर लाभकारी देखने की आकांक्षा इनके दूरदृष्टि वादिता का प्रमाण है।हिंदी के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हुए देवनागरी को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए देशवासियों को जागृत करने का आवाहन किया गया है इनके द्वारा। चिंटू थप्पा लिखित ’नागरी लिपि और राष्ट्रीय एकता’ नामक पत्र भी देवनागरी के साथ-साथ ’नागरी लिपि परिषद’ की उपयोगिता कार्य और प्रभाव पर लिखा प्रभावशाली पत्र है।डॉक्टर उमेश कुमार मिश्र लिखित ’मानक वर्तनी एवम अशुद्धियां’ में मानक वर्तनी की आवश्यक मानकीकरण, वर्तनी संबंधी कुछ ध्यातव्य बातें और वर्तनी संबंधी त्रुटि के साथ-साथ वर्तनी दोष निवारण हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव को जिस शुक्ष्मता से प्रस्तुत किया गया है,उसे गहराई से पढ़ने के बाद कोई अहिंदीभाषी भी देवनागरी के प्रयोग में त्रुटिमुक्त हो जाएगा। शोधार्थियों के साथ _साथ यह आलेख हर वर्ग के पाठकों, लेखकों के अलावे समस्त हिंदी प्रेमी के लिए भी उपयोगी है। ’भाषा और लिपि के ज्ञान से बढ़ेगी सबकी पहचान’ नामक टिप्पणी में ललित शर्मा ने हिंदी के विकास और इसके स्थान निर्धारण को उद्घाटित करने का सफल प्रयत्न किया है। महज हिंदी पखवाड़े मना कर इसकी वैश्विक परिकल्पना करना मूर्खता है।भाषा और लिपि के दिनोदिन होती प्रसिद्धि के कारण के मूल में कहीं न कहीं साहित्य सृजन के बीज ही निहित हैं।ऐसे में ’नागरी संगम’ के प्रयास की प्रशंसा करना यथोचित ही है। डॉ विजय नारायण रेड्डी तेलुगु से अनुदित ’कबूतर’ कविता प्रकृति प्रदत जीवन और मानव कृत धर्मांतरण पर एक तीक्ष्ण प्रहार करता है। जहां प्रकृति के लिए सभी समान है,वही मानव ने धर्म के नाम पर सभी जगहों को विषाक्त कर रखा है। मुझे तमिल तो नहीं आती परंतु एक भाषा या बोली से अनूदित रचना में परिवर्तन सहज ही दृष्टिगोचर होते हैं।
पत्रिका के अंत में नागरी लिपि का लक्ष्य, उद्देश्य और सार्थकता की विस्तृत जानकारी ने इस पत्रिका परिवार से जुड़े नए लोगों को इसके कार्य क्षेत्र से विशेष तौर से परिचित कराने का उत्तम कार्य किया है।
’नागरी संगम’ यूंही निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होती रहे और कामयाबी के बुलंदियों को छूते हुए ऐश्वर्य के फलक पर विराजमान हो। जिससे नागरी लिपि वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि पा सके। इन्हीं शुभेक्छाओं के साथ नागरी संगम परिवार को ढेरों शुभकामनाएं और बधाईयां।त्रुटि हेतु क्षमा करेंगे।

