
शीर्षक——-रूह महज़ सुकून चाहती है———
एक रूह है जिसको सुकून की तलब है……..एक मिज़ाज है जिसको जुनून की तलब है……..
रूह को क़ायदे क़ानून की तलब है, मिज़ाज को इश्के मोहब्बत के मज़मून की तलब है।
एक रूह है जिसको मासूमियत और सादगी की तलब है………एक मिज़ाज है जिसको आवर्गी की तलब है……….
एक रूह है जिसको शराफ़त की तलब है, एक मिज़ाज है जिसको चाहत की तलब है।
एक रूह है जिसको उस ईश्वर की इनायत की तलब है, एक मिज़ाज है जिसको प्यार से भरी हसरत की तलब है।
रूह चाहती है कि हम निभाएँ जिम्मेदारियाँ और रिश्तेदारियाँ, मिज़ाज चाहता है कि हम करें नादानियाँ और शैतानियाँ।
रूह को पसन्द हैं करीबियाँ और नज़दीकियाँ, मिज़ाज को पसन्द हैं प्रीत प्रेम के रिश्तों की बारीकियाँ।
रूह को पसन्द है सार्थकता, अच्छी मानसिकता, मिज़ाज कभी कभी करना चाहता है इश्क़ करने की ख़ता।
रूह चाहती है कि ज़िन्दगी बने एक बन्दगी, ज़िन्दगी में हो पाक़ीज़गी……….मिज़ाज चाहता है दीवानगी , दीवानगी और दीवानगी……..
रूह को है अच्छे काम करने की मसरूफ़ियत , मिज़ाज चाहता है आशिक़ी करने की फुर्सत।
रूह को है नेकनामी की अभिलाषा, मिज़ाज समझता हैं सिर्फ़ इश्क़ ओ मोहब्बत की भाषा।
रूह चाहती है जिंदगानियों में हो अपार मुस्कुराहटें , मिज़ाज हमेशा सुनना चाहता है इश्क़ ओ मोहब्बत की आहटें ।
रूह को भाता है सब्र, मिज़ाज को भाती है बेक़रारी , अवाज़ारी……..
रूह चाहती है कि इंसान सोए चैन से, मिज़ाज चाहता है कि नैना हमेशा रहें बेचैन से ।
हूँ गफ़लत में , मानूँ तो किसकी मानूँ……आप मेरी उलझन सुलझा दो तो आपको परम ज्ञानी जानूँ…………..
अगर मेरे मन की पूछो , तो रूह और मिज़ाज दोनो ही हैं अहम, दोनो ही हैं महत्वपूर्ण, दोनो ही बनाते हैं ज़िंदगानियों को सम्पूर्ण………
लेकिन दोनो का फ़र्क़ है नज़रिया , रूह चाहती है अदब और तहज़ीब की सुनो मौसिकी , और ये नामुराद मिज़ाज चाहता है आशिक़ी ही आशिक़ी………….
मेरे मेहेरबानो, निकालो कोई हल, कोई समाधान………..रूह और मिज़ाज के इस झगड़े में पिस रहा है हर इंसान…………
सोच समझ कर फैंसला करना, ना करना जल्दबाज़ी , और आपको नसीहत को मानने के लिए हूँ मैं राज़ी……..
ज़मीर , दिल और जिगर से करना गुफ़्तगू ……….फिर फ़ैसला करना, मुझे तो महज़ सही मार्ग पर चलने की है आरज़ू।
कवि——-निरेन कुमार सचदेवा।