
सुनो गनेशा
आज विसर्जन-
दिन तुम्हारा
बेहद उदास है
मन,
इतने दिन तुम थे
घर में तो
भरे रहते थे विश्वास
से हम।
जानते हैं
है दुनियावी ये
दस्तूर,
जो आया वो
जाएगा इकदिन तो
हम सबसे दूर,
जाओगे तभी तो
फिर आओगे यही है
आस मन में
भरपूर।
सच गनेशा
जब तलक तू था
घर में
खुशहाली, समृद्धि का
संसार बसा था
घर में,
रिद्धि-सिद्धि थीं
साथ तुम्हारे
तीन लोकों का
वरद् हस्त था हमारे
घर में।
आज गनेशा
मन भारी पर तन
उत्फुल्ल है
बिन माँगे जो दिया है
तूने पाकर मानस
उत्कंठित है,
लाये थे जिस जोश-
ओ-उल्लास में
वही उल्लास बरकरार
विसर्जन में,
मगर भारी मन से
कर विसर्जन
यही प्रार्थना करते हम
अगले बरस फिर
आना बप्पा घर में
हमारे।
डा.नीलम