ग़ज़ल ( हिंदी)

ग़ज़ल ( हिंदी)

नहीं है आज सिर पे ताज पर कल तो हमारा है ।
चलें देखें समंदर का कहां दूजा किनारा है ।

सजी मंदिर की मूरत बोल सकती है अगर चाहो ,
लगे उसको किसी ने आज अंदर से पुकारा है ।

नुकीली धार पानी की जमा पर्वत हिला देती ,
सभी नदियों ने अपना रास्ता खुद ही निखारा है ।

जरा सी चोट लगती है कलेजा मात का हिलता ,
खुदा ने रूप अपना नाम माँ देकर उतारा है ।

कभी सोचा नहीं हमने पिताजी छोड़ जाएंगे ,
लगाया बाग हांथों से वही अब तो सहारा है ।

गिने क्या पैर के छाले कभी अपने बज़ुर्गों के ,
जलाकर हाथ अपने आग में हमको सँवारा है ।

लपट आने लगी है रोग की पिछली सदी जैसी ,
किसी ने खो दिया बापू कहीं खोया दुलारा है ।

गढ़े मुर्दे भी अपना दर्द कहते हैं सुनो “हलधर”
चुनावों में हमारे देश का ऐसा नज़ारा है ।

                  हलधर

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