
घर से बाहर भले आप जाया करो ।
एक काजल का टीका लगाया करो ।।
लग न जाएं हमारी नज़र आपको ।
इस तरह से नज़र मत मिलाया करो ।।
दौर नफ़रत का है मशविरा मान लो ।
हर किसी को न अपना बनाया करो ।।
ये उदासी नहीं ठीक है आप पर ।
जब हो दिल को सुकूं मुस्कुराया करो ।।
इश्क़ की दास्तां है मुक़म्मल तभी ।
रोज रूठें भले वो मनाया करो ।।
क्या करें इश्क़ जो हो गया आपसे ।
नाज नखरें न इतने दिखाया करो ।।
प्रेम परिणय बना तो कभी वेदना ।
श्रेष्ठ दोनों है साथी बताया करो ।।
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बृजमोहन “साथी” डबरा ग्वालियर म.प्र. (मो.9981013061)