गीतिका(सजल)

इतना होगा मुश्किल, स्मृति को भुलाना,                                                                             
कहते घर दूर कहाँ, करते वो बहाना ।।1।

कोलाहल चिड़ियों की,लहलहाती धरती,
सुगंधित पवन भावन ,वासर जो सुहाना ।।2।

मन में प्रेम गुदगुदी, नयन पाता जो सुख,
इक नाम पर सर्वस्व,जीवन हो मिटाना ।।3।

अंधा आधुनिक बस, छाप छोड़ता रहा,,
भूलते गए दिन-दिन, सुन्दर वो तराना ।।4।

संज्ञान की चौपाल, रह-रहकर सताए,
जीने दे घबराहट, भूला वो जमाना ।।5।

पड़ोस के चार गांव, नाम रहता जिनका,
उनको प्रायः पड़ता, बेटे को मनाना ।।6।

जर्जर मन मसोसता,भवन शोक छानता,
प्रतिभा तड़प रह गई, पाहुन को बुलाना ।।7।

(स्वरचित, मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित है)
प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”
चेन्नई

दिनांक:-02/09/2025

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