महुआं ने अंगराई ली, चहुं ओर बासंती बयार
आम्र देख बौराए मन,किया धरती ने धानी श्रृंगार।
सीमर की शोभा मन मोहे,गेहूं पक तैयार,
नवयौवना बन लहराए अलसी,रंग बिखेरे गुलनार।
राग,द्वेष को भूल के सारे,खूब लुटाओ प्यार,
रामलला सिर मुकुट विराजे,लो आया नववर्ष त्योहार।
यज्ञ,हवन,भगवा अपनाओ, छोड़ पाश्चत्य व्यवहार,
निर्मल कर तन_मन को,दो प्रकृति को उपहार।
फिर से जगाओ सनातन धर्म को,भरके भीषण हुंकार,
सांसे वही जो जड़ से जोड़े,बाकी जीवन बेकार।

