
शीर्षक——इश्क़ पागलपन नहीं तो और क्या है——-??
उसकी गली से गुज़रेगी मेरी मय्यत , फ़रिश्ते ये लालच दे कर मेरी जान ले गए ।
जान तो उस पर हम ने उस दिन ही न्योछावर कर दी थी , जिस दिन पहली बार उसका ख़याल आया था दिल में , मुक्ति दिला दी इन फ़रिश्तों ने , जो मेरे प्राण ले गए ।
लेकिन हारा नहीं हूँ यारो, जीत हुई है मेरी, ऐसा कर फ़रिश्ते मुझे मेरी शान दे गए ।
गर्व है मुझे अपने आप पर , मैंने जुनूने इश्क़ ओ मोहब्बत के कारण अपनी जान दी , ये फ़रिश्ते मुझे मान और सम्मान दे गए ।
प्रीत पाक हो तो फिर इंसान हर हद से गुज़र सकता है , मुझे इस ज़िन्दगी नाम की कश्मकश से आज़ाद कर ,फ़रिश्ते इस बात का प्रमाण दे गए ।
मानता हूँ मैं कि प्यार था एक तरफ़ा और मैं अपने आप को दे रहा था धोखा !
रूबरू तो उसके मैं कभी हुआ ही नहीं , अब तो कभी हो पायूँगा भी नहीं , लेकिन ये भी तय है कि क़ब्र में भी मैं उसे भुलायूँगा नहीं ।
उसके घर के सामने से निकला था मेरा जनाज़ा , अफ़सोस ये कि फिर भी उसको मेरी शहादत का नहीं था अन्दाज़ा ।
लेकिन उसके बग़ैर क्या ज़िंदगी जी रहा था मैं , चौबीसों घंटे ग़म के घूँट पी रहा था मैं ।
सिर्फ़ एक बार , महज़ एक बार उसकी तस्वीर देखी दी , और मैं हो गया था पागल , उसका क़ायल !
दिल और साँसें नहीं चल रहीं थीं , लेकिन जब मेरा जनाज़ा निकला था उसकी गली से , तो उसके ऊँचे रसूक का मुझे अहसास हो गया था ।
शुकराना है तुम्हारा फ़रिश्तो , तुम्हारे कारण मैं हमेशा के लिए सो गया था ।
जब उसकी तस्वीर देखी थी , तब उसके ऊँचे रसूक के बारे में मुझे नहीं थी मालूमात ।
और मैं एक मामूली इंसान , जिसे लगी हुई थी प्यार की लाइलाज बीमारी , तो निस्सन्देह बननी नहीं थी बात ।
तो जी कर भी मैं क्या करता , हर दिन तड़पता , तरसता उसके दीदार को ।
तो मेरे मेहेरबानो , क्या मुझे भी मजनू कहोगे , उम्मीद करता हूँ कि शाबाशी तो दोगे मेरे इस जज़्बाते प्यार को !
कवि———-निरेन कुमार सचदेवा।