
शीर्षक——-प्यार का मरहम लगाने से सब ज़ख़्म भर जाते हैं——-
ज़ख़्म हैं कि दिखते नहीं, मगर ये मत सोचिए कि दुखते नहीं ….
आँसुओं का खरा पानी तो हमेशा ही रहता है नैनों में, मगर ये आँसू हमेशा तो बहते नहीं ।
बहुत दुःख दर्द सहने पड़ते हैं ज़िंदगी में , लेकिन हम हमेशा तो सब कुछ कहते नहीं ।
ज़ख़्म हैं , उन पर मरहम लगानी पड़ती है, ना चाह कर भी ज़िंदगी यूँ ही बितानी पड़ती है !
प्यार और प्रीत का मरहम लगाने से , ज़ख़्म भरने का भी अंदेशा है ।
ये मैं नहीं कह रहा, उस परम पिता परमेश्वर ने भेजा ये संदेशा है ।
ज़ख़्म कितने भी हों , सब हँसता मुस्कुराता चेहरा ही देखना चाहते हैं !
क्या बताएँ , ये नामुराद दुनिया वाले , हरेक को अपनी ही तरह से आज़माना चाहते हैं , परखना चाहते हैं ।
पता नहीं क्या भावनाएँ पनपती हैं इन दुनिया वालों के दिलों में , ते ख़ुद हम भी समझना चाहते हैं ।
ख़ैर , कुछ भी हो , संतुष्ट रहिए , तृप्त रहिए, मेरे मालिक , तेरा बहुत शुक्र है, बस हमेशा यही कहिए !
कवि———निरेन कुमार सचदेवा।