जहाँ तक हो सके जुड़े रहना बुजुर्गों से… “निरेन कुमार सचदेवा।”

शीर्षक——बुजुर्गों का ऐहतराम कीजिए ———

जहाँ तक हो सके जुड़े रहना बुजुर्गों से…….चट्टानों से जुड़े पत्थर टूटते हैं मुश्किल से……..
और ये पुराने ज़माने के लोग, प्यार करते हैं दिल से……..तभी तो किनारों को ये लगते हैं साहिल से……….
इनके बालों की सफ़ेदी को ना करना नज़रंदाज़, इस सफ़ेदी में छिपे हुए हैं अनेकों राज़।
ये आपको सिखाएँगे कि कैसे सही मार्ग का करना चाहिए चयन, ये खुशहाल ख़ुशनुमा बना देंगे आपका जीवन।
अनुभव बड़ी चीज़ है, समझते हैं ना आप, और इन्हें बहुत ज्ञान है, ये मानते हैं ना आप।
मुसीबत आने पर ये आपके साथ रहेंगे, ये भी जानते हैं ना आप ?
इन बुजुर्गों में निस्स्वार्थ मदद करने की होती है कामना, इन बुजुर्गों को आप कभी भी ना आज़माना , ना परखना।
बस इनके दिखाए मार्ग पर सदैव आप चलना।
होते हैं स्वभाव से ये सीधे सादे, ना होते हैं ये चालक, ना मौक़ापरस्त ना धोखेबाज़………
दौड़े चले आते हैं किसी मज़लूम की सुन आवाज़।
किसी के काम आना , ये है इनकी विशेषता, इनके हाव भाव में छलकती है सार्थकता।
दृढ़ सुविचार होते हैं इनके , ये होते हैं फ़ौलादी चट्टानों कीं भाँति।
इनके दिलों में बहता है प्रेम प्रीत का समुंदर, ये चाहें तो ला सकते अहसासे प्यार की क्रान्ति।
इस सब महानुभावों को करता हूँ मैं नतमस्तक होकर प्रणाम।
ये होते हैं आस्तिक, प्रभु की करते हैं तहे दिल से पूजा, इसीलिए तो उस रचेता ने इन्हें दिया है लम्बी उम्र का ईनाम……….
कवि——निरेन कुमार सचदेवा।

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