
जीवन और प्रेम में कभी-कभी
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‘जीवन और प्रेम’ में
कभी-कभी
एक तरफ की
‘एक छोटी सी नासमझी की त्रुटि’
जब दोनों तरफ के एक महान सुन्दर-सुखमय-प्रेममय- मोहक-जीवन, उसके सपने तथा —
उसकी हँसी-खुशी की सम्भावना का ध्वंसन कर देती है…
और जब-
नहीं रह जाता है कोई उपाय-
उन अतीत के सपनों में-
उन सम्भावित जीवनों को टटोलने की; खोजने और पाने की तथा
वापस लौटने की…;
और जब
सुखमय-हर्षमय-सौन्दर्यमय-समृद्धि से भरे
‘जीवन-स्वार्थ की आशा;’ —
किसी तरह से पूर्णतः निर्मूल होकर
समय के बवण्डर में कण-कण से
धूल-धूसरित होकर बिखर जाती है
तथा जब
जन्मों-जन्म के ‘एकल-सपने’ अलग-अलग होकर
अपने-अपने ढंग से
आँखों की गहराइयों में
सपाट होकर किसी एक तरफ से चुभने लगते हैं…
तथा जब
‘दोनों तरफ से अपलक दर्शन की भूख’
वर्तमान में किसी भी तरफ से आँखों में कसैलापन पैदा कर
नहीं पहचानती-
उन सपनों को
उन यादों को
उन बातों को…
और जब
हम दूसरी तरफ–
वैसे ही पूर्ववत, मोहग्रस्त होकर
मिथ्या-आरोपों, तिरस्कारों व अपमानों के विषबुझे तीरों का दंश सहते रहते हैं…
तब, एक दिन-
‘निर्दोष-आत्मा’ लहूलुहान हो जाती है…
और हम अपने ही सामने अपनी जिन्दगी को तिल-तिल कर-के
रुग्ण होकर कराहते…
तथा ‘सपनों-को’ टूटी हुई कमर के साथ घिसटने के निरर्थक प्रयास करते-
और मरते देखा करते हैं
——+-+——**🖍️ बृजेश आनन्द राय, जौनपुर 6394806779