कब्र

निकल पड़ा मन
दिल की सफर पर
उसने दिल जुड़ने
दिल टूटने की
देखी दिल ने
फ़िर मन का सफर
एक कब्र पर
आकर टिक गया
रात के सन्नाटे में
झिंगुरों की आवाज
गूंज रही थी।
कुहासे से ढंकी
कब्रों पर ओस की
बूंदे बिखरी थीं इधर उधर
शायद अतृप्त आत्मा को
प्यार की ठंडक दे रही थी
कोमल मन को
उस कब्र से प्रेम हो गया
रोज़ जब उदास होता मन
सुकून का पल गुजारता
मानों उस कब्र से
पुराना याराना हो
शिशिर की पूनम की रात थी
मन पहुंच गया
कब्र के पास
आज अजीब सा
खुशनुमा माहौल था
बैठ गया मन
उस कब्र के पास
तभी कोई फुसफुसाता है
आ गए तुम मन का
सवाल हल करने
मैं कौन हूं ये जानने
मै तो वही हूं प्रिय
जो सदा से प्रेम का
देवता बनकर हर दिल में
रहता हूं कभी मनु तो
कभी श्रद्धा बनकर
सृष्टि का संचार करता है
कभी आदम हव्वा
तो कभी राधा कृष्ण बनकर
लोगो में प्रेम भरता हूं
तुम्हारा इंतजार तो
सदियों से है तभी
तो खींच चली आती हो तुम
जाओ जिओ तुम
अपने आज को
पाया है शरीर आज अलग
पर आत्मा तुम पुराना हो
मै वही प्रेम का प्रथम देव हूं
तुम मेरी छाया हो
जी लो तुम आज को देवी
कल मेरे पास आना है
लिपटा लिया रूह
मेरे मन को तृप्त कर दिया
अंतरात्मा को।
चाह नहीं रहा था मन
उस रूह से जुदा होने को।
एक दिन मिलूंगा तुमसे
रूह ने वादा किया
भींग गया मन मेरा
रूह से अलविदा लेकर।
फिर मिलने का वादा करके
रूह को विदा किया।

संजू शरण
स्वतंत्र लेखन
समीक्षक
समाज सेवी

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