
कौन रहा है तुम बिन प्यारा।
संग, सखा और हृदय दुलारा।।
एक तुम्हीं हो मधुऋतु-जाई।
फूल सरीखी सुखद सुहाई।।
रूप सलोना मधुरिम भाए।
याद तुम्हारी बहुत सताए।।
भूल किया जो हृदय लगाया।
रीति यहाँ की समझ न पाया।।
मीत सुनो! ये वचन हमारा।
जीवन क्या, ये तन-मन हारा।।
मैं सब खोया, सपन-सुहाने।
है बहु पीड़ा, तपन-पुराने’।।
खोट रहा जो ‘मनस-छिपाए’।
आज वही तो दरश दिखाए।।
रात-दिनों को असहज पाया।
बात रही क्या, परख न पाया।।
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बृजेश आनन्द राय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश 6394806779