गुज़रे इश्क़ की गलियों से और समझदार हो गए , कुछ ग़ालिब बने यहाँ और कुछ गुलज़ार हो गए।
गुलज़ार और ग़ालिब के अलावा हम जगजीत सिंह साहेब के भी हैं क़ायल , इन सब की शेर ओ शायरी कर देती है दिलों को घायल ।
जगजीत जी ने अपने नाम अनुसार , अपनी शायरी से जग को लिया है जीत , अजब थी इन सब महानुभावों की शायरी से प्रीत ।
हम भी इनके शागिर्द बनना चाहते हैं , और आप सब के दिलों को जीतना चाहते हैं ।
इश्क़ की गली से हम भी गुज़रे हैं, इसीलिए हम भी टूटे फूटे शायर बन चुके हैं ।
इश्क़ की गली में मिली हमें बस बेतहाशा पीड़ा , मिला बहुत दर्द और नाकामयाबी ।
दिल तो ज़ख़्मी यक़ीनन हुआ , लेकिन हमारी शायरी में , इसी वजह से आ गयी रंगत गुलाबी ।
दिल पे चले जो नशतर , तो दिल लहु लुहान हो गया , पर इस सदमे का हम पर कुछ तो अहसान हो गया ।
हमारी इस हालत के कारण हमारी लेखनी में आ गया बहुत निखार और हमारी शायरी हो गयी असरदार ।
लोग कहते हैं कि पढ़ कर हमारी शायरी वो हो जातें हैं भावुक , इसी अन्दाज़ के हम थे इच्छुक ।
दिल के हो चुके हैं हज़ारों टुकड़े , इसी वजह से हमारे शेर हैं निखरे निखरे ।
क्या बताएँ यारो, जब हम लिखते हैं तो हमारी क़लम की रवानी में भी दिखते हैं आँसू !
बस यही सोच मन में आश्वासन होता है कि , हम फैला रहें हैं वातावरण में दर्दे दिल के अहसासों और जज़्बातों की ख़ुशबू !
कवि———निरेन कुमार सचदेवा।

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