राघव और नयन बचपन के अभिन्न मित्र थे।
राघव बड़े सपनों के साथ महानगर चला गया और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ गया।
नयन गाँव में रहकर बच्चों के लिए एक पाठशाला चलाने लगा।
बरसों बाद राघव गाँव लौटा। चमक-दमक से भरी ज़िंदगी के बावजूद उसकी आँखों में अकेलेपन की धुंध थी।
उसने नयन से कहा—
“मैं बहुत दूर तक गया, पर भीतर खालीपन ही पाया।”
नयन मुस्कुराया और बोला—
“सफ़र की असली ताक़त मंज़िल नहीं, साथी होते हैं।
अगर हम साथ चलें तो सचमुच चलेंगे दूर तक।”
दोनों ने मिलकर गाँव के बच्चों के सपनों को उड़ान देने का संकल्प लिया।
अब उनका सफ़र न सिर्फ़ उनका, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी हो गया।
समाजसेवी और साहित्यकार मीना पांडेय जी पटना बिहार