मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता ।__ “बृजेश आनन्द राय,”

मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता ।
पहुँचे शिखरों पर भी टिकना, बिल्कुल आसान नहीं होता।।

सदा जागरित सपनों के हित, दिन-रात जागरण होता है।
कभी हृदय की धड़कन तो, सुख-चैन कभी ‘वो,’ खोता है।
आँसू में ही बह जाते हैं शुभ पाने के परिणाम सभी।
रह जातीं बस आह – कराहें, अरु हो जाते बदनाम कभी।
काँटा बिखरे पगडंडी में सबको विश्राम नहीं होता।
मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता।

मनुज मात्र जब-भी जीवन में आकार बदलने वाला हो।
अपने से सुन्दर नव-विस्तृत संसार बदलने वाला हो।
वह प्रेम-प्रणय की भाषा में, सच को अपनाकर चलता हो।
वह अपने पुरुषार्थ ज्ञान से, नित-नया शोध हल करता हो।
तब नव-नव राहों में उसके- ‘रुकना,’ आधार नहीं होता ।
मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता।।

जीवन की डगमम नैया में, ‘श्रम’ होता है पतवार जभी।
खार-समुन्दर में तब जग के होकर रहते हैं पार सभी।
धूल-धूसरित लथ-पथ तन पर जब बिखरे हैं श्रम के मोती।
तन कंचन सा चमक उठे है, माथे-स्वर्णिम आभा होती।
श्रम-चन्दन-कोमल-कान्ति बिना, लावण्य निखार नहीं होता।
मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता।।

मंजिल पर जब मिले सफलता, मंजिल का इतिहास बदलता।
मंजिल पर जब किस्मत बदली, मंजिल का विश्वास है बढता।
मंजिल बदले ‘भाग्य-सितारे’, मंजिल अपनी ओर पुकारे।
कैसा भी तूफान खड़ा हो, मंजिल फिर भी हमें निहारे ।
मंजिल के सुख-आगार बिना, सबको आराम नहीं होता ।
मंजिल का सबको मिल पाना, इतना आसान नहीं होता।।
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बृजेश आनन्द राय,
जौनपुर, उत्तर प्रदेश 6394806779

1 Comment

  1. Brijesh Anand rai

    सही बात है।
    प्रकाशन हेतु धन्यवाद मित्र।

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