
शीर्षक———इस टूटे दिल की पीड़ा सही ना जाये———!!
मेरे सिवा भी कितने लोग तनहा है ,जो तनहाईयों से बातें करते हैं ।
अल्फ़ाज़ तो भूल जाते हैं, जज़्बातों से बातें करते हैं ।
दिन तो फिर भी किसी तरह से इनके लिए बीत जाता है, लेकिन बहुत मुश्किल से रातों के लम्हे कटते हैं ।
सच पूछो ऐसे लोग ना मुकम्मल जीते , हैं , और ना मुकम्मल मरते हैं !
अकेलापन भी एक अभिशाप है , पता नहीं ऐसे बाशिन्दों ने पुनर्जन्म में किए होते कितने घोर पाप हैं ?
और खुदा ना ख़स्ता अगर ये तन्हाई उजड़ी मोहब्बत की देन है , तो बद से बदतर हो जाते हैं हालात !
अफ़सोस , इन नाकामयाब आशिक़ों को ये मिली है इश्क़ करने की सौग़ात।
सच पूछो तो ऐसे दिलजले आशिक़ शायर भी बन जाते हैं और ख़ूब नाम कमा पाते हैं !
टूटा दिल, बेचैनी , दर्द और पीड़ा का जहाँ हो मिश्रण ,उस जगह लगता है एक टूटे आवारा आशिक़ का मन !
ऐ काश इस कायनात में बेवफ़ाई ना होती , फिर रूसवाई ना होती !!
लेखक——निरेन कुमार सचदेवा।