” मेरी माँ “

” मेरी माँ “


आंचल मेरी माँ का, पावन पुनीत मनोरम।
याद आता नित्य मुझे, माँ का लाड दुलार अनुपम।
निस्वार्थ भाव से सेवा करती माँ ताउम्र।
शिकायत नहीं कभी किसी से करती।
ममतामय स्पर्श माँ का याद बहुत आता मुझको।।

मधुर कर्णप्रिय लोरी गाती।
प्यार से थपकी दे दे, मुझको सुलाती।
कर्ज माँ का मुझ पर बहुत है।
ऊऋण न हो सकते कभी हम।
चाहे हो कितने ही धनवान।
ममतामय स्पर्श माँ का याद बहुत आता मुझको।।

रग- रग में माँ समाई रहती।
देती मुझको अमृत जीवन धार।
जब कभी मन उदास -उचाट हो जाता,
याद बहुत माँ की आती।
सीख माँ की पग- पग राह दिखाती मुझको।
ममतामय स्पर्श माँ का, याद बहुत आता मुझको। ।

अपने बच्चों के पालन पोषण में,
अनुकरण माँ की सलाह का करती।
देवी रूप में दर्शन माँ देती।
हाथ सिर पर धर देती।
गम अपने सभी, झट भूल जाती मैं।
सृष्टि का मूलाधार है माँ, याद सदा रखती हूंँ मैं।
ममतामय स्पर्श माँ का, याद बहुत आता मुझको।।

चंद्रकला भरतिया
नागपुर महाराष्ट्र.

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