
शीर्षक———सच्ची प्रीत सिर्फ़ एक बार होती है ——-
ना पूछिए कितनी दुशवार है ये इश्क़ की नौकरी——-दिल तबादला नहीं चाहता।
सच पूछो तो उसका सेवक हूँ, ये मज़दूरी का काम है मुझे बहुत भाता।
लेकिन वो देते नहीं तरक़्क़ी , हैं थोड़े शक़ी——-!
और हम हैं दिल फेंक आशिक़, लेकिन उनके प्रेम जाल में फँस कर———बन चुके हैं अब एक रसिक।
थे नास्तिक, लेकिन अब वो मेरे भगवान हैं, तो बनना पड़ा आस्तिक।
करता हूँ अब उस ईश्वर की भी और उनकी भी पूजा, मेरे लिये उन जैसा नहीं है कोई और दूजा।
तरक़्क़ी के नाम पर हम क्या माँगते हैं——-महज़ दो मीठे बोल, चाहते हैं कि हमारे जीवन में कुछ ज़्यादा शक्कर दें वो घोल।
करते हैं बखूबी उनकी नौकरी, उनसे हमेशा अदब से पेश आते
हैं——-नख़रा बिलकुल भी नहीं करते , वह जब चाहें, उनके पैरों को दबाते हैं।
उनके हुस्न की तारीफ़ कर, हमने लिख दिया है एक संपूर्ण उपन्यास।
शायद वो कभी पढ़ लें, इस बात की है अब आस।
हैं थोड़े नासमझ, है बेवजह उन्हें शक करने की आदत।
अब हम तो सब हसीनाओं से गुफ़्तगू करते हैं, कुछ ऐसी ही है हमारी फ़ितरत।
लेकिन हमारे दिल ओ जान पर सिर्फ़ छाया हुआ है उनका
नशा——वो हमारे लिए हैं एक रंगीन कहकशा।
इसीलिए तो हम उनके इश्क़ में हैं क़ैद, बहुत मज़बूत हैं ये इश्क़ की फ़ौलादी सलाख़ें।
बस , चाहते हैं कि उनके पहलू में कटे, बाक़ी के बचे दिन, बाक़ी की बची रातें।
हाँ, थे मनचले, लेकिन अब हो चुके हैं दिलजले।
ख़ैर, हमें बहुत पसंद आया है, ये जो हुआ है परिवर्तन।
उनके कदमों में हमने अपना जीवन कर दिया है अर्पण।
अब क्या है उनकी रज़ा, बस वो जानते हैं या जानता है उनका ख़ुदा।
तो हम ने भी उस परवरदिगार की अदालत में दे दी है ये
दरखास्त——।
मेरे मालिक, कुछ ऐसा कर कि वो हमें अपना बना लें, नहीं तो फिर हमें इस दुनिया से कर दे बर्खास्त।
अगर पुनर्जन्म में इंसान बने , तो फिर और ज़्यादा करेंगे उस रब की इबादत।
क्यूँकि तब भी उन्हें पाने की हसरत होगी, हर जन्म में उन्हें चाहेंगे——-सदियों सदियों तक क़ायम रहेगी हमारी मोहब्बत——-!!
कवि———निरेन कुमार सचदेवा।