पंख बिन परवाज़ हर दिल प्यार से।पर रहे मोह्ताज भी इकरार से।

एक ग़ज़ल लिखने का प्रयास।

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
२१२२-२१२२-२१२
पंख बिन परवाज़ हर दिल प्यार से।
पर रहे मोह्ताज भी इकरार से।

इल्म कहने का नहीं दिल को मिला,
सज नहीं सकता किसी इजहार से।

ख़ुश रहे अपनी खुदी से दिल सदा,
जब नहीं सजता किसी इसरार से।

अज्म मुश्किल से सजा करते यहाॅं,
जब जुबां खुलती किसी दिलदार से।

हसरतें सबकी सजाते हैं खुदा,
है चहल भी तो इसी अबरार से।

स्वरचित/मौलिक रचना।
एच. एस. चाहिल। बिलासपुर। (छ. ग.)

परवाज= उड़ान, उड़ने का भाव।
इसरार= आग्रह या हठ करना।
अज्म= संकल्प, इरादा, प्रतिबद्धता।
अबरार= सुन्दर, ईश्वर से डरने वाला।

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