जीवन भर खटते ही रहना, कैसी उद्यमता है माँ की।
सबको सुख दे, दुख ही पाना, अनिवार्य विषमता है माँ की।।
कलियुग की संतानों के घर-घर, देख रही व्यवहार अधम।
फिर भी बन जाती कामधेनु, कैसी अनुपमता है माँ की!
दे जन्म पेट से बाहर कर, फिर ओढ़े फिरती है उसको।
ढोती है भार नहीं थकती, क्या अद्भुत क्षमता है माँ की।
सोती गीले में स्वयं सुलाकर, निज बच्चे को सूखे में।
अपने सुख-चैन बिछा देती, अलबेली ममता है माँ की।
आँचल की छाया है विशाल, सिर पर न धूप आने देती।
सारे वट-वृक्ष पड़ें छोटे, क्या कोई समता है माँ की??
देने का चाव सदा जिसमें, पाने की चाह न कैसी भी।
बौने अपनत्व सभी जग के, अभिनव उत्तमता है माँ की!!
—डाॅ०अनिल गहलौत